आलोक वर्मा से छिनी CBI डायरेक्टर की कुर्सी, चलेगा आपराधिक मामला

सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल किये जाने के मात्र दो दिन बाद आलोक वर्मा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली एक उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति ने गुरुवार को एक मैराथन बैठक के बाद एक अभूतपूर्व कदम के तहत भ्रष्टाचार और कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही के आरोपों में सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया। समिति के सदस्य के तौर पर प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के प्रतिनिधि के तौर पर आए जस्टिस सीकरी ने एक मत से वर्मा को हटाने का फैसला लिया। जबकि कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसका विरोध किया। बता दें की वर्मा को बाकी बचे 21 दिनों के कार्यकाल के लिए फायर सर्विस का महानिदेशक बना दिया गया है।

दरअसल केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब इस तरह से किसी निदेशक को हटाया गया हो। सरकार की ओर से जारी आदेश के अनुसार, 1979 बैच के आईपीएस अधिकारी आलोक वर्मा को गृह मंत्रालय के तहत अग्निशमन विभाग, नागरिक सुरक्षा और होम गार्ड्स का महानिदेशक नियुक्त किया गया है। सीबीआई निदेशक का प्रभार फिलहाल अतिरिक्त निदेशक एम. नागेश्वर राव के पास है। आलोक वर्मा के तबादले पर सोशल मीडिया में तमाम तरह की चर्चाएं हो रही हैं। लोग सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। कई लोग पूछ रहे हैं कि अगर आलोक वर्मा भ्रष्ट और नाकाबिल थे तो वो एक पद के लिए अनफिट और दूसरे के लिए फिट कैसे हो सकते हैं। एक यूजर ने लिखा है, एक पद के लिए भ्रष्टाचार का आरोप कैसे लगाया जा सकता है और दूसरे के लिए नहीं? एक अन्य यूजर ने लिखा है, “यह कैसा तंत्र है कि एक व्यक्ति पांच दिन पहले सीबीआई निदेशक पद के लिए उपयुक्त रहता है और पांच दिन बाद भ्रष्ट होकर अनुपयुक्त।

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हीं अपने ऊपर लगे आरोपों पर चुप्पी तोड़ते हुए वर्मा ने गुरुवार रात को एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि एक प्रमुख जांच एजेंसी होने के नाते सीबीआई भ्रष्टाचार से निपटती है, इस संस्थान की स्वतंत्रता को संरक्षित और सुरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘संस्था को बिना बाहरी प्रभाव के काम करना चाहिए। मैंने संस्थान की अखंडता को बनाए रखने के प्रयास किए जबकि उसे बर्बाद करने की कोशिशे हुईं। इसे केंद्र सरकार और सीवीसी के 23 अक्तूबर, 2018 को दिए आदेश से देखा जा सकता है जो अधिकार क्षेत्र के बिना थे।’ वर्मा ने कहा कि यह दुखद है कि उनका समिति के आदेश पर किसी दूसरी पद पर तबादला कर दिया गया। वह भी उस एक व्यक्ति द्वारा लगाए गए झूठे, निराधार और तुच्छ आरोप लगाकर जो उनका विरोधी था।बता दें की आलोक वर्मा को 24 अक्टूबर 2018 को केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की रिपोर्ट के बाद जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था। 77 दिन यानी करीब ढाई महीने तक जबरन छुट्टी में रहने के बाद बुधवार यानी 09 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा को बहाल कर दिया था। इसके बाद बुधवार को आलोक वर्मा ने सीबीआई मुख्यालय पहुंचकर पदभार भी संभाल लिया था। व

 

 

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