देहरादून हाई प्रोफाइल लूटकांडःसीसीटीवी में आरोपी कैंद ,फिर भी आरोपी घूम रहे आजाद, क्यों हो रही लापरवाही

देहरादून में चुनाव से पहले पुलिस महानिरीक्षक गढ़वाल अजय रौतेला की कार में सवार तीन पुलिसकर्मियों ने आचार संहिता की आड़ में प्रापर्टी डीलर अनुरोध पंवार को लूट लिया था। मामला करोड़ो की लूट का है। सीसीटीवी से भी आरोपी और वारदात का खुलासा हो चुका है लेकिन आरोपी अभी भी आजाद घूम रहे है। पुलिस मामले का खुलासा करने में लापरवाही कर रही है। एसटीएफ की और से भी लिपापोती कि जा रही जिससे यह साफ जाहिर हो रहा कि पुलिसकर्मियों और मामले के पीछे के मास्टमाइंड को बचाव का समय दिया जा रहा है।जिन आरोपित पुलिस कर्मियों को अफसरों ने पुलिस लाइन में नजरबंद रखने का दावा किया था, वे पुलिस की नाक के नीचे से फरार हो गए हैं।

जानकारी के अनुसार बीती चार अप्रैल की रात देहरादून के प्रापर्टी डीलर अनुरोध पंवार से गढ़वाल के पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) अजय रौतेला की सरकारी स्कार्पियो में सवार तीन पुलिस कर्मियों ने मोटी रकम लूट ली थी। रकम एक करोड़ रुपये बताई जा रही है। मामले का खुलासा पांच अप्रैल को हुआ। पुलिस अधिकारियों ने मामला सही पाए जाने पर दस अप्रैल को डालनवाला कोतवाली में लूट का मुकदमा दर्ज करा दिया गया। इसी दिन तीनों पुलिस कर्मी दारोगा दिनेश नेगी, सिपाही मनोज अधिकारी व हिमांशु उपाध्याय को निलंबित कर पुलिस लाइन से संबद्ध कर दिया गया। साथ ही तीनों की निगरानी बढ़ा दी गई, ताकि वे पुलिस लाइन से बाहर कदम न रख सकें। लेकिन तीनों अरोपी फरार हो गए है।

आरोपी दारोगा का प्रमोशन कर दून में दूबारा हुई पोस्टिंग

गौरतलब है कि इसस पहले दून के पटेलनगर क्षेत्र में दारोगा और कुछ पुलिस कर्मियों पर एक मुकदमे के आरोपितों के गहने और वाहन चोरी करने के आरोप लगे थे। मामले में जांच चली तो आरोपित दारोगा और सिपाही के ट्रांसफर कर दिए। बाद में दारोगा इंस्पेक्टर बन गया और दोबारा दून में पोस्टिंग मिल गई। वहीं इस मामले में भी अब सवाल यह उठाता है कि जांच मिलने के तीन दिन बाद भी एसटीएफ ने क्यों आरोपित पुलिस कर्मियों को अपनी अभिरक्षा में नहीं लिया। एसटीएफ के अपर पुलिस अधीक्षक स्वतंत्र कुमार ने कहा कि अभी तो हमने जांच शुरू की है, पुख्ता सबूत मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई की दिशा तय होगी। हाईप्रोफाइल लूटकांड में पुलिस से लेकर एसटीएफ तक की जांच कई सवाल खड़े करती है। वह ये कि जांच एजेंसी उत्तराखंड पुलिस के दामन पर लगे कलंक को कोई दूसरा रूप देने की कोशिश तो नहीं कर रही है। अपराध साबित हो चुका है और अपराध करने वाले भी पहचाने जा चुके हैं। फिर किस भय से एसटीएफ आरोपितों पर शिकंजा नहीं कस रही है। कहीं, इन सबके पीछे किसी बड़े अफसर या नेता का नाम तो नहीं, जो इस जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।

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बता दें कि जिस पुलिस से आमजन न्याय की उम्मीद करते हैं, उसकी छवि उत्तराखंड में कुछ वर्षों से बिगड़ने लगी है। खासकर भ्रष्टाचार के मामले में पुलिस पर दोहरी कार्रवाई के आरोप लगते रहे हैं। इस मामले में भी पुलिस का दोहरा रवैया देखने का मिला है। दागी पुलिसवालों को बचाने में उनके ही अफसरों का हाथ रहा है। अब तक पुलिस की छवि खराब करने वाली जितनी भी घटनाएं हुईं, उनमें जांच के सिवा कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई। जबकि अपने अधिकारों की मांग करने वाले पुलिसकर्मियों को नौकरी तक गंवानी पड़ गई है। देखते है कि इस मामले में पुलिसकर्मियों और उसके पिछे के मास्टर माइड का नाम सामने आता है या फाइलों में मामले को दबाने की कोशिश कर आमजन को गुमराह कर लिया जाएगा।

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