देहरादून का 300 करोड़ की लागत से बना ड्रेनेज मास्टर प्लान फाइलों में दफन, शहर जलभराव से परेशान

देहरादून का 300 करोड़ की लागत से बना ड्रेनेज मास्टर प्लान फाइलों में दफन, शहर जलभराव से परेशान

देहरादून में मानसून शुरू हो चूका है ऐसे में हर साल की तरह इस साल भी सड़कें जलमग्न है। शहर में हर तरह पानी पानी है। आमजन जलभराव की समस्यां से जूझ रहा है। वही शासन द्वारा ३०० करोड़ की लागत से सालो पहले बना राजधानी का ड्रैनेज का मास्टर प्लान फाइलों में दफन है। करोड़ों रूपए से शहर के ड्रैनेज सिस्टम को बने मास्टर प्लान पर कुछ काम नहीं हुआ।

दरअसल देहरादून शहर के ड्रैनेज सिस्टम को सुधारने के लिए वर्ष 2008 में सरकार द्वारा मास्टर प्लान बनाया गया था। तीन सौ करोड़ की लागत से बने इस मास्टर प्लान में पूरे शहर भर में सुनियोजित तरीके से नालों के निर्माण का खाका खीचा गया था। कार्यदायी संस्था पेयजल निगम के पास इसके लिए बजट ही नहीं था। चार साल बाद यानी वर्ष 2012 में फिर से मास्टर प्लान पर काम हुआ। तब इसकी लागत राशि 487 करोड़ तक पहुंच गई। इन चार चालों में कई बार मास्टर प्लान को लेकर नगर निगम व पेयजल निगम के बीच बैठकें हुई, लेकिन नतीजा सिर्फ शून्य रहा। बता दे की मास्टर प्लान को अमल में लाने के लिए पेयजल निगम, नगर निगम , एमडीडीए व एनएच की संयुक्त टीम बनी , इसके बाद मास्टर प्लान को नगर निगम की बोर्ड बैठक में रखा गया था। जिसमें पार्षदों की ओर से ड्रैनेज सिस्टम के मास्टर प्लान पर आपत्ति लगाते हुए खामियां बतायी थी और वापस संशोधन के लिए मास्टर प्लान पेयजल निगम को भेज दिया गया।

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तबसे यह करोड़ो का मास्टर प्लान फाइलों में ही दफन हो कर रह गया है। 2008 में ड्रैनेज के मास्टर प्लान के तहत काम करने में 300 करोड़ का खर्चा बताया था जो कि अब 750 करोड़ तक पहुंच गया है। सवाल इस बात का है अभी तक यह साफ नहीं है कि मास्टर प्लान को अमल में लाने के लिए रकम कहां से जुटायी जाएगी। फिलहाल पेयजल निगम की फाइलों में मास्टर प्लान शोपीस बना हुआ है। सड़के शुरुवाती मानसून में ही जलमग्न है। जगह जगह नालियां चोक है , गढ्ढे है जहां सड़कों पर बाद से असर देखे जा सकते है। बारिश से लोगों के घरों दुकानों के पानी भर जाता है। राजधानी देहरादून के कुछ इलाकों में नाले तक नहीं है। जिस कारण बारिश का पानी सड़कों में जमा होता है। थोड़ी सी बारिश में यहां पर सड़क जलमग्न हो जाती है। सरकार द्वारा महज योजनाएं बनाई जाती है ,आमजन को बताया जाता है हम यह योजना बना रहे है , यह कार्य किया जाएगा परन्तु धरातल पर सब शून्य होता है। किसी प्रकार की कार्यनीति नहीं की जाती।

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