आज से लग रहा है होलाष्‍टक ,जानिए इससे जुड़ी कुछ खास बाते और कैसे रहता है असर

आज से लग रहा है होलाष्‍टक ,जानें क्या होता है इसमें ,कैसे रहता है असर

होली से पूर्व आठ दिनों तक होलाष्‍टक रहता है, इन दिनों में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है। इस बार होली 213 मार्च को है और होलाष्टक 14 मार्च से होलाष्टक प्रारंभ हो रहे हैं और 21 मार्च तक चलेंगे।, इन 8 दिनों में कोई भी अच्छा काम नया काम शुरू करने को मना किया जाता है। ज्योतिश अनुसार होलाष्टक को अशुभ माना गया है। उन्होंने बताया कि संक्रांति भी 14 मार्च को होगी, लेकिन चूंकि पुण्यकाल 15 मार्च से माना जाएगा। इसलिए इस दिन से खरमास भी शुरु हो जाएगा।

पौराणिक और वैज्ञानिक तरीके से ऐसा माना जाता है कि इन दिनों में नेगेटिव इनर्जी रहती है जिसका असर बुरा पड़ सकता है।इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती है। इस बार 23 फरवरी से होलाष्‍टक शुरू होंगे। और एक मार्च यानी होलिका दहन के साथ ही समाप्‍त हो जाएगा।  ये भी एक मान्यता है कि भक्त प्रह्लाद की अनन्य नारायण भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप ने होली से पहले के आठ दिनों में प्रह्लाद को अनेकों प्रकार के जघन्य कष्ट दिए थे। तभी से भक्ति पर प्रहार के इन आठ दिनों को हिंदू धर्म में अशुभ माना गया है। वैसे इस बार पूर्णिमा तिथि का क्षय है। होलाष्टक की अवधि भक्ति की शक्ति का प्रभाव बताती है। इस अवधि में तप करना ही अच्छा रहता है। भारत के कई हिस्सों में होलाष्टक शुरू होने पर एक पेड़ की शाखा काट कर उसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े बांध देते हैं और उसे जमीन में गाड़ते हैं। इसे भक्त प्रहलाद का प्रतीक माना जाता है।

इस दिन के लिए एक मान्यता यह भी प्रचिलित है की इस दौरान कामदेव भस्‍म हुए थे शिव पुराण के अनुसार देवताओं के अनुरोध पर कामदेव ने अपना प्रेम बाण चलाकर शिवजी की तपस्या भंग कर दी। इससे महादेव अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया। कामदेव के भस्म होते ही सृष्टि में शोक व्याप्त हो गया। अपने पति को पुन: जीवित करने के लिए रति ने अन्य देवी-देवताओं सहित महादेव से प्रार्थना की। प्रसन्न होकर भोलनाथ ने कामदेव को पुनर्जीवन का आशीर्वाद दिया। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को कामदेव भस्म हुए और आठ दिन बाद उनके पुनर्जीवन का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

यह भी पढ़ेंः देश एक होली मनाने के तरीके अनेक , जानें कहाँ किस तरह मनाई जाती है होली

होलाष्टक समाप्त होते ही धुरेड़ी अर्थात रंगों के त्योहार का प्रारंभ होगा। फाल्गुन माह में होलिका दहन के पश्चात रंग-गुलाल की होली होगी, एवं शुभ घड़ी पुनः प्रारंभ होगी। गोबर से होती थी लिपाई पुराने जमाने में होलाष्टक प्रारंभ होते ही उग्र ग्रह के प्रभाव से बचने के लिए होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती थी साथ ही वहां पर होलिका का डंडा लगा दिया जाता था

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *