यहां मां हर फरियादी की सुनती है पुकार

यहां मां हर फरियादी की सुनती है पुकारयहां मां हर फरियादी की सुनती है पुकार

नई दिल्ली। भारत में हर मंदिर का अपना महत्व है जहां देश-विदेश के श्रद्धालु सच्चे मन से मंदिर में पूजा–अर्चना करते हैं। वहीं देवभूमि हिमाचल में देवी-देवताओं के कई प्राचीन व प्रसिद्ध मंदिर हैं। वहीं कांगड़ा में बज्रेश्वरी देवी माता का मंदिर स्थित है। इस स्थान को नगरकोट की रानी के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था। यहां तीन धर्मों के प्रतीक के रूप में मां की तीन पिण्डियों की पूजा होती है। कहा जाता है जो भक्त यहां सच्चे मन से मां की उपासना करते हैं उसे मनोवाच्छित फल की प्राप्ति होती है।

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मां बज्रेश्वरी देवी के धाम के बारे मे कहते हैं कि जब मां सती ने पिता के द्वारा किए गए शिव के अपमान से कुपित होकर अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे, तब क्रोधित शिव उनकी देह को लेकर पूरी सृष्टि में घूमे। शिव का क्रोध शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। शरीर के यह टुकड़े धरती पर जहां-जहां गिरे वह स्थान शक्तिपीठ कहलाया। मान्यता है कि यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था इसलिए ब्रजरेश्वरी शक्तिपीठ में मां के वक्ष की पूजा होती है। माता बज्रेश्वरी का यह शक्तिपीठ अपने आप में अनूठा और विशेष है क्योंकि यहां मात्र हिन्दू भक्त ही शीश नहीं झुकाते बल्कि मुस्लिम और सिख धर्म के श्रद्धालु भी इस धाम में आकर अपनी आस्था के फूल चढ़ाते हैं। कहते हैं ब्रजेश्वरी देवी मंदिर के तीन गुंबद इन तीन धर्मों के प्रतीक हैं। पहला हिन्दू धर्म का प्रतीक है, जिसकी आकृति मंदिर जैसी है तो दूसरा मुस्लिम समाज का और तीसरा गुंबद सिख संप्रदाय का प्रतीक है। मंदिर परिसर में भगवान लाल भैरव का मंदिर भी है। मंदिर में विराजित लाल भैरव की प्रतिमा लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी बताई गई है। कहा जाता है कि जब भी कांगड़ा पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो इस प्रतिमा की आंखों से आंसू अौर शरीर से पसीना आने लगता है। उसके बाद पुजारी विशाल हवन का आयोजन करते हैं अौर मां से इस विपदा को टालने के लिए प्रार्थना करते हैं। मां ब्रजेश्वरी देवी की इस शक्तिपीठ में प्रतिदिन मां की पांच बार आरती होती है। सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही सबसे पहले मां की शैय्या को उठाया जाता है। उसके बाद रात्रि के श्रृंगार में ही मां की मंगला आरती की जाती है।

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