इराक़ः करबला में अरबईन के लिए पहुंचे विभिन्न धर्मों के करोड़ों श्रद्धालु,जानिए क्या है अरबईन

Iraq: Two million pilgrims from various religions reached for Arabian in Karbala

दुनियाभर से करोड़ों की संख्या में विभिन्न धर्मों के जायरीन (श्रद्धालु) सालाना अरबईन मातम के लिए मंगलवार को इराक़ के पवित्र नगर कर्बला में जिहादी हमलों की धमकी को दरकिनार कर पहुंचे। जो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े में उपस्थित होकर लब्बैक या हुसैन के नारे लगा रहे हैं।बता दे की विश्व में अरबईन का वक़्त ऐसा होता है जब एक साथ इतनी बड़ी जनसख्या एक स्थान पर इकठ्ठा होती है। जो अपने आप में अनूठा है।

दुनिया का सबसे बड़ा और भव्य धार्मिक कार्यक्रम अरबईने हुसैन

प्राप्त समाचारों के अनुसार इस वर्ष चेहलुम के अवसर पर 5 करोड़ से अधिक श्रद्धालु करबला पहुंचे है। बता दे की श्रद्धालु 70 किलोमीटर (45 मील) दूर, बगदाद, उत्तर में 9 0 किलोमीटर (55 मील) का पैदल सफर कर अरबईने हुसैनी में भाग लेने आने आते है। विभिन्न क्षेत्रों, नस्लों, जातियों, धर्मों और पंथों से संबंध रखने वालों का इस भव्य कार्यक्रम में भाग लेना, इस भव्य समारोह का एक अन्य अनोखा दृश्य है। जो हर भेदभाव को दरकिनार कर इंसानियत और आपसी भाईचारे का संदेश देता है। गौरतलब है कि पश्चिमी देशों की ओर से अरबईन मिलियन मार्च की ख़बरों और उसके वास्तविक दृश्यों को पेश करने से रोके जाने के विभिन्न प्रयासों के बावजूद इस भव्य घटना ने अपनी व्यापकता का ऐसा दृश्य पेश किया है कि पश्चिमी मीडिया भी इसको स्वीकार करने पर विवश हो गया है। फ़्रांस-24 टेलीवीजन चैनल ने अरबईन के हवाले से अपनी रिपोर्ट में इसे दुनिया का सबसे बड़ा और भव्य धार्मिक कार्यक्रम माना है।

इसलिए होता है चेहलुम
दुनिया भर के मुसलमानों ने हज़रत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की शहादत का 40वाँ दिन पूरा होने पर उन्हें अपने-अपने तरीक़े से याद किया। चेहल्लुम मुसलमानों के कैलेंडर के मुताबिक़ सफ़र के महीने की 20 वीं तारीख़ को पड़ता है। मुहम्मद साहब के छोटे नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में इमाम हुसैन का चेहलुम (चालीसवां) मनाया जाता है। चेहल्लुम को इमाम हुसैन की शहादत के चालिस दिन हुए थे। इमाम हुसैन ने यजीद के आतंक के खिलाफ जंग लड़ी जिसमें 72 लोग शहीद हुए थे। आतंकियों ने सभी को मार डाला था। उन्हीं शहीदों का गम मोहर्रम में मनाया जाता है, जो सवा दो महीने तक होता है।सन 61 हिजरी की 10 मोहर्रम की तारीख़ को इमाम हुसैन और उनके छह महीने के बेटे नन्हे अली असगर सहित उनके 72 वफ़ादार साथियों को यज़ीदी फ़ौज ने इसलिए भूखा प्यासा शहीद कर दिया क्योंकि उन्होंने यज़ीद जैसे भ्रष्ट शासक का आज्ञापालन करने और उसका साथ देने से इंकार कर दिया था। जुल्म की हदे पार करते हुए यज़ीद की फौज ने नन्हे छह महीने के बच्चे अली असगर को तब शहीद किया जब वह भूख प्यास से बिलख रहा था और इमाम हुसैन उसे लेकर फौज के पास आते है की इस नन्हे बच्चे को पानी पीला दो , यह तीन दिन का भूखा प्यासा है इसकी माँ का दूध खुश्क ( सूख) हो गया है। इस मासूम का क्या जुर्म है। अगर तुम्हे लगता है की इसकी एवज में मै पानी ले लूंगा तो तुम्हारे सामने इसे रख रहा हूँ। लेकिन जैसे ही इमाम हुसैन नन्हे अली असगर को जलती रेत पर रख कर पीछे होते है। यजीद के सिपाही पानी के बदले तीन मुँह के तीर से अलीअसगर का गला छेद देते है। इतना ही नहीं शहीदों के सरो को कलम करके तीरो की नोक पर सरे आम बाजार में घुमा गया। और 40 दिन तक उनके बेसर लाशे कर्बला में बेदफन रहे।

1400 साल बाद भी ‘लब्बैक या हुसैन की सदाएं बुलंद

पैग़म्बर रसूल के घर की बेटियों, बहुओं और नन्हे मासूम बच्चो को बेपर्दा कर कैदी बनाकर बाजारों में घुमाया गया। और उन्हें कैदखाने (जेल) में डाल दिया गया। इस घटना के चालीसवें दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत ज़ैनब उनकी क़ब्र का दर्शन करने के लिए कर्बला पहुंची थीं। उस समय से हर साल इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का चालीसवां मनाया जाता है। कर्बला की जंग इसकी मिसाल है कि आतंक से कैसे लड़ा जाता है। कर्बला इराक में मौजूद है। तकरीबन 1400 साल पहले तीन दिन तक भूखा प्यासा रखकर कुंद खंजर से इमाम हुसैन का गला काट दिया गया था। इस कब्र पर चेहलुम मनाने के लिए शिया मुस्लिम ही नहीं बल्की दुनिया भर के विभिन्न धर्मों के लोग ‘लब्बैक या हुसैन’ (हुसैन हाज़िर हूं) की सदाएं बुलंद करते हुए उनकी कब्र पर पहुंचते हैं। दिलचस्प बात है की इनकी तादाद हज जाने वालों से भी कई गुना हो जाती है।

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सेवा स्थल कर रहे श्रद्धालुओं की सेवा 

आपको बता दें कि श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए 30 हज़ार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है और 21 हज़ार गाड़ियां श्रद्धालुओं की सेवा में हैं जबकि 10 हज़ार मौकिब या सेवा स्थल श्रद्धालुओं की सेवा कर रहे हैं। इसी के साथ खेल और युवा मंत्रालय के आठ हज़ार स्वयंसेवी स्वेच्छा से श्रद्धालुओं की सेवाएं कर रहे हैं जबकि 104 विदेशी और 670 स्थानीय पत्रकार अरबईन के मिलियन मार्च को कवरेज दे रहे हैं। इराक़ के विभिन्न शहरों से कर्बला की ओर पैदल मार्च भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सहायता की घोषणा का अद्वितीय दृश्य है जिसमें ईरान, इराक़, भारत और पाकिस्तान सहित दुनियाभर से करोड़ों की संख्या में आज़ादी के मतवाले और स्वतंत्रताप्रेमी भाग लेते हैं और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के लक्ष्य को पूरा करने के लिए हुसैनी लश्कर के ध्वजवाहक हज़रत अब्बास के ध्वज के नीचे अपनी वफ़ादारी पर मोहर लगाते हैं।

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