राफेल डील पर सुप्रीम कोर्ट में 5 घंटे तक चली सुनवाई, याचिकाकर्ताओं को कोर्ट ने दिया बड़ा झटका

Rafael Deal upheld 5-hour trial in Supreme Court

राफेल विमान सौदे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को करीब 5 घंटे लंबी मैराथन सुनवाई के बाद सीबीआई जांच की मांग वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान सभी संबंधित पक्षों की तरफ से अपनी-अपनी दलीलें पेश की गईं। वहीं राफेल की कीमत को सार्वजनिक करने की मांग कर रहे याचिकाकर्ताओं को कोर्ट से उस वक्त बड़ा झटका मिला, जब कोर्ट ने कहा कि जबतक हम खुद सार्वजनिक नहीं करें, तब तक इस पर कोई चर्चा नहीं होगी।

रक्षा सौदे की तय प्रक्रिया का उल्लंघन, नए सौदे में दाम 40 फीसदी ज्यादा

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने फ्रांस से 36 राफेल विमान खरीद सौदे पर सुबह से लगातार सुनवाई चल रही थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं और सरकार के साथ-साथ वायुसेना अधिकारियों से भी विस्तार से उनका पक्ष सुना। सुप्रीम कोर्ट में बहस की शुरुआत प्रशांत भूषण से हुई। भूषण ने कहा कि राफ़ेल विमान खरीद में रक्षा सौदे की तय प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है। इस मामले में सीबीआइ जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार कानून में सीबीआइ को शिकायत दी थी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ा। भूषण ने कहा कि सरकार इस बात को लेकर बेवजह की बहस कर रही है कि कीमत बताने को लेकर कोई गुप्त समझौता हुआ है। जबकि सच ये है कि नए सौदे में राफेल के दाम 40 फीसदी ज्यादा हैं।

रक्षा मंत्री को भी नहीं थी इस बदलाव की जानकारी ,दैसो के साथ मिलकर साजिश

प्रशांत भूषण ने कहा कि यह दैसो के साथ मिलकर की गई साजिश है, जिसमें रिलायंस को ऑफसेट पार्टनर का अधिकार दिया गया। रिलायंस के पास ऑफसेट कंपनी के तौर पर काम करने की क्षमता नहीं है। प्रधानमंत्री के द्वारा की गई डील में हुए कथित बदलावों के बारे में किसी को नहीं पता। यहां तक की रक्षा मंत्री को भी इस बदलाव की जानकारी नहीं थी। एक झटके में विमान 108 से 36 हो गए और ऑफसेट रिलायंस को दे दिया गया। सरकार कह रही है कि उसे ऑफसेट पार्टनर का पता नहीं। लेकिन प्रोसेस में साफ है कि बिना रक्षा मंत्री की अनुमति के ऑफसेट तय नहीं हो सकता है। ऑफसेट बदलने के लिए सरकार ने नियमों को बदला और तुरंत उसे लागू किया।राफेल डील में ऑफसेट पार्टनर के रूप में रिलायंस का चुनाव एक कमीशन है। यह मेरा आरोप है और मैंने इसे प्रमाणित करने के लिए दस्तावेज जमा कर दिए हैं। सरकार कह रही है कि ऑफसेट पार्टनर चुनने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है जबकि नियम के मुताबिक ऑफसेट पार्टनर के एग्रीमेंट के लिए रक्षा मंत्री के दस्तखत की जरूरत होती है। यह अपने आप मे विरोधाभासी है

सरकार ने संसद में राफेल विमान की कीमत का किया खुलासा
अरुण शौरी ने कहा कि उस समय रक्षा मंत्री रहे मनोहर पर्रिकर ने घोषणा की थी कि राफेल सौदा प्रधानमंत्री मोदी का निर्णय है और मैं इसका समर्थन करता हूं। यह दिखाता है कि रक्षा मंत्रालय लूप में नहीं था। सवाल यह है कि कैसे शून्य अनुभव वाली एक कंपनी को पहले शामिल किया जा सकता है और इस तरह के एक बड़े सौदे की ऑफसेट दी जा सकती है।उन्होंने सौदे और राफ़ेल की क़ीमत न बताने को लेकर सवाल उठाया। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की ओर से पेश हुए वकील ने कीमत को ही लेकर कहा कि सरकार ने संसद में राफेल विमान की कीमत का खुलासा किया है, ऐसे में कीमत न बताने की बात कहना बेमानी है। जिसके बाद अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कोर्ट को राफ़ेल सौदे की पृष्ठभूमि बताई और ये भी जानकारी दी कि पिछला सौदा क्यों रद किया गया। अटर्नी जनरल ने बताया कि दसॉ ने सरकार को ऑफसेट पार्टनरों की जानकारी नहीं दी है। उन्होंने कहा कि ऑफसेट पार्टनरों को दसॉ ने चुना, सरकार का इसमें कोई हाथ नहीं है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में यह स्वीकार किया कि फ्रांस की सरकार ने 36 विमानों की कोई गारंटी नहीं दी है लेकिन प्रधानमंत्री ने लेटर ऑफ कम्फर्ट जरूर दिया है।

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सिर्फ तीन परिस्थितियों में ही इंटरगवर्नमेंटल रूट का इस्तेमाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ऐडवोकेट एमएल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार द्वारा दाखिल की गई जानकारी से खुलासा हुआ है कि मई 2015 के बाद फैसला लेने की प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी की गई है। याचिकाकर्ता ने पांच जजों की संवैधानिक पीठ के सामने मामला सुने जाने की मांग की है। पूर्व मंत्री और याचिकाकर्ता अरुण शौरी की तरफ से कोर्ट में पेश हुए सीनियर वकील प्रशांत भूषण, जो खुद भी इस मामले में याचिकाकर्ता हैं, ने कहा कि सिर्फ तीन परिस्थितियों में ही इंटरगवर्नमेंटल रूट का इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इस डील में फ्रांस की सरकार की तरफ से संप्रभुता की कोई गारंटी नहीं दी गई है।करीब 5 घंटे लंबी मैराथन सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

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