तरन्नुम के जज्बों को सलाम;बेटी की बेहतर जिंदगी के लिए साइकिल से लेकर टक्र तक के बनाती है पंचर

मां जगत की जननी है, इसका हृदय हिमालय से भी बड़ा है। वह मुश्किल से मुश्किल हालातों के थपेड़े को सहन कर अपने बच्चों को अच्छा भविष्य देने के लिए संघर्ष करती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण लखनऊ से सटे सीतापुर की तरन्नुम का देखने को मिला है। शादी के बाद एक खुशहाल जीवन जीने का सपना हर लड़की का होता है, लेकिन तरन्नुम की जिन्दगी शादी के बाद उजड़ गयी। पति बिमार हो गए। काम- काज नहीं होने, अपनों के ही अनदेखा करने के बाद वह खुद घर संभालने के लिए घर से निकली। और ‘तरन्नुम पंचर वाली’ के नाम से मशहूर हो गई।

जिस उम्र में सजती-संवरती हैऔरतें, उस उम्र में उठाए लोहे का औजार

35 वर्षीय तरन्नुम ने 23 साल पहले ऐसे काम को अपनाया जिसे शायद कोई लड़की यह सोचकर न अपनाए की वह पुरूषों का काम है वह नहीं कर पाएगी। हमारा समाज महिला को कमजोर समझता है, उसके लिए कुछ काम सुनिश्चित कर दिए गए है कि महिला यह काम कर सकती है। लेकिन इस मानसिकता को दूर कर तरन्नुम ने बीमार पति की हालात को देखते हुए ,बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए परिस्थितीयों से लड़ते हुए फैसला किया की वह किसी के घर पर काम नहीं कर सकती थी। वह अपने पति के पंचर की दुकान पर ही काम करेगी। और जिस उम्र में औरतें सजती-संवरती है, उस उम्र में तरन्नुम ने लोहे का औजार लेकर पंचर बनाने का काम शुरू कर दिया। और पिछले 23 साल से अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए पंचर बनाने का काम कर रोजाना दो सौ से चार सौ रुपए कमाती है।

बेटी को मिले बेहतर जिंदगी

जानकीपुरम विस्तार के मुलायम तिराहे के पास ‘तरन्नुम पंचर वाली’ नाम से उनकी दुकान चलती है।  सीतापुर जनपद के गंगापुरवा गाँव की रहने वाली है। उनके तीन बच्चे हैं जिसमें से एक बेटी है। तरन्नुम का सपना है कि जिस तरह की ज़िन्दगी वह जीने को मजबूर है, उनकी बेटी भी ऐसी ही ज़िन्दगी गुज़ारे। वो उसे एक खूबसूरत दुनिया देने के लिए संघर्ष कर रही है। तरन्नुम के पति कलीम अली को तरन्नुम पर गर्व है। उनकी पत्नि ने उन्हे और परिवार की वह जिम्मेदारी संभालनी जिसे उन्हे संभालना चाहिए था।

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महिला पंचर वाली को देखकर ग्राहक हैरान

बता दें कि उनकी दूकान पर आने वाले ग्राहक महिला पंचर वाली को देखकर हैरान हो जाते है। कुछ लोग उनकी तारीफ करते है तो कुछ लोग उनका मजाक भी बनाते हैं। लेकिन लोगों के मजाक बनाने से उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनका मानना है कि जब उनके पास खाने को नहीं था तब कोई खाने को देने नहीं आया था। अब तो उन्हे काम की ऐसी आदत लगी है कि दुकान पर नहीं आती हूँ तो शरीर दर्द करने लगता है।’’ तरन्नुम पंचर बनाने के अलावा पेंटिंग भी करती है।

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