हाशिए पर है उत्तराखंड के बेरोजगारों का भविष्य, सरकार के दावे खोखले

The marginalized Uttarakhand's unemployed future

उत्तराखंड राज्य गठन के पीछे अन्य मुद्दों के साथ ही एक मुख्य मुद्दा यह भी था कि यहां के बेरोजगारों को राज्य में ही रोजगार मिल सकेगा। जितनी भी सरकारें आई और जितने में जनप्रतिनिधि चुनकर आए उन्होंने इस मुद्दे को हाशिए पर डाल दिया। उत्तराखंड सरकार द्वारा 2018 को रोजगार वर्ष के रूप में मनाने का संकल्प लिया गया था। लेकिन धरातल पर लागु न हो सकी।  संकल्प सिर्फ स्वपन बनकर रह गया।

वर्तमान डबल इंजन सरकार के द्वारा दिए गए रोजगार की एक झलक जिसे धरातल उतरने मे समय लगेगा। 

  • 1218 पद फॉरेस्ट गार्ड जिसमें उस बेतुके स्टे को खारिज नहीं कर पाए जबकि हाईकोर्ट कह चुका है कि विना पेपर दिए कोई नियमित नियुक्ति नहीं होगी और एक बार स्टे खारिज होने की स्थिति आयी तो तुरंत इनके तीन तीन विभाग यह कह गए कि हम फिजिकल नहीं करा सकते।
  • 400 पद vdo औरvpdo तीन तीन बार शैक्षिक योग्यता बदलने के बाद तय नहीं कर सके कि होगा क्या।
  • 1000 पद पटवारी के अभी तक पद ही सृजित ना हो सके।
  • 700 पद चकबंदी लेखपाल का पता नहीं क्या हुआ।
  • 1000 पद पुलिस के RTI से पता चला है की पुलिस में अभी कोई भी पद खाली नहीं है जब तक विभागीय प्रमोशन नहीं होते।
  • 1400 पद कनिष्ठ सहायक और एल टी के है।
  • आबकारी व प्रवर्तन सिपाही फिजिकल रामभरोसे है।
  • गेस्ट टीचरों की नियुक्ति पर असमंजस की स्थिति है।

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नैनीताल जिले को ही लें तो राज्य गठन के बाद से अब तक रोजगार दफ्तरों में 1 लाख 5 हजार 844 बेरोजगार पंजीकृत हैं, लेकिन रोजगार मिला है मात्र 1618 को। दूसरी ओर बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता मिलना भी अब बंद हो गया है। जिले में 7485 आवेदकों को बेरोजगारी भत्ता नहीं मिला है। इसके लिए 13 करोड़ रुपए की दरकार है। हर दृष्टि से बेरोजगार अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। आंकडों पर अगर नजर डालें तो वर्ष 2001-02 में 12514 बेरोजगारों में से मात्र 25 को रोजगार मिला।

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