अपने हक के लिए सरकार से लड़ रहे अर्द्ध सैनिक,शहीद हुए सिपाहियों के बच्चे ठोकर खाने को मजबूर

देश के हर वर्ग के नागरिकों के दिल में सेना के जवानों के लिए जितन इज्जत है अफसोस की बात यह है कि हमारे देश के नेता और सरकार उनकी उतनी ही अनदेखी करते है। वादे और घोषणाएं तो करते है लेकिन धरातल पर उनकी हकिकत कुछ और ही होती है। देश की सेवा और सुरक्षा में विगत 80 वर्षों से सदैव हरपल तत्पर रहने वाले अर्द्ध सैनिक बल आज अपने ही देश में पहचान का मोहताज है।  इनकी वीरता और बलिदानों की कहानियां देश के हर कोने से जुड़ी हुई हैं। सरहद पर देश की रक्षा करते हुए शहिद होने के बाद भी उन्हें शहीद का दर्जा नहीं मिलता है। आम जन उन्हे शहीद तो कहते है,लेकिन उन्हे न शहीद का दर्जा मिलता है न ही कोई सुविधा, और उनके बच्चे ,परिवार मुफलिसी में जीवन बिताने के लिए मजबूर हो जाते है।

बता दें कि पुलवामा में शहीद हुए सीआरपीएफ के सिपाही अवधेश यादव के अंतिम संस्कार के समय उनका दो वर्ष का बेटा अपने मृतक पिता की तरफ कुछ न जानते हुए भी ताक रहा था। लेकिन इसे हमारे देश का दूर्भाग्य ही कहेगे कि आज से सोलह साल के बाद यदि इस मासूम को कोई नौकरी नहीं मिल पाई तो यह बेचारा दसवीं पास करके सीआरपीएफ में सिपाही की नौकरी पाने के लिए अपने पिता की शहीदी की दुहाई देकर एक दिन मारा-मारा फिरेगा और नौकरी के लिए इतना परेशान हो जाएगा कि महीनों तक धक्के खा कर भी शायद ही इसे कोई नौकरी मिलेगी। वजह यह कि शहीदों के बच्चों को इतने सालों के बाद नौकरी देने का अभी तक कोई ठोस कानून नहीं बना है।

किस बात के लिए कर रहें शहीद-शहीद ? 

आज भी पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए सिपाहियों के बच्चे ठोकर खाते फिर रहें हैं।  सोलह साल के बाद यह लड़का अपने शहीद पिता के सरकारी कागज ही नहीं ढूंढ पाएगा, क्योंकि आजतक किसी भी सरकार ने अर्द्ध सैनिक बलों के शहीदों को शहीद का दर्जा नहीं दिया है। जब सरकार ने आजतक अर्द्ध सैनिक बलों के शहीदों को शहीद ही नहीं माना है तो फिर हम किस बात के लिए शहीद-शहीद कर रहें हैं?  यह समझ में नहीं आता कि इस देश के करोड़ों लोग किस बात के लिए इनको शहीद-शहीद पुकार रहें हैं? देश के लिए हंसते हंसते जान न्योछावर करने के बाद भी अर्द्ध सैनिक बल मुफलिसी में जीवन जीने और सरकार से अपने हक के लिए लड़ने को मजबूर है।

देश सेवा मे आगे और सुविधाओं मे पीछे है अर्द्ध सैनिक

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) इस बल की स्थापना 27 जुलाई 1939 में तत्कालीन गृहमंत्री स्वर्गीय  सरदार वल्लभ भाई पटेल ने की । इस बल ने आजादी के बाद रियासतों के हिन्दुस्तान में विलय में प्रमुख भूमिका निभाई थी । इस बल ने 21 अक्टूबर 1959 को चीन युद्ध के दौरान लेह लद्दाख के हॉट स्प्रिंग में वीरता, साहस और कौशल की एक अद्वितीय मिसाल रच दिया था।विश्व की ऐतिहासिक जंगो मे दर्ज इस दिन को पूरा देश पुलिस शहीद दिवस के रूप में याद करता है । यह बल वो हैं जो बस मुट्ठी भर हो कर मात्र 136 जवानों ने 9 अप्रैल 1965 की लड़ाई के दौरान गुजरात के रन ऑफ कच्छ के रेगिस्तान में पाकिस्तानी ब्रिगेड 3500 जवानों की पूरी ब्रिगेड को न केवल घुटनों पर ले आये बल्कि पराजित कर पीछे लौटने पर मजबूर कर दिया था । इस दिन को पूरा देश *शौर्य दिवस* के रूप मे याद किया करता है।

उत्तर-पूर्व के उग्रवाद और पंजाब के आतंकवाद को किया खत्म

इस बल के जवान वो हैं जिन्होंने उत्तर-पूर्व के उग्रवाद को और पंजाब के आतंकवाद को अपनी बंदूकों के जोर पर ख़त्म किया है । ये वो बहादुर हैं जिन्होंने 13 दिसम्बर 2001 को आतंकवादियों के हमलों से देश की संसद की रक्षा की थी । यह बल हमारी आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती है। दिल्ली मे संसद, अयोध्या के राम मंदिर, मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि, काशी विश्व नाथ मंदिर, कटरा मे माँ विष्णु देवी, अमरनाथ यात्रा आदि की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी इसी बल के ऊपर है। देश मे कही पर भी सांप्रदायिक दंगों के दौरान नीली वर्दी पहने (RAF) द्रुत गति से नजर आने वाले भी इस CRPF बल के ही जवान हैं ।

पत्थरबाज ,नक्सलवाद,प्राकृतिक आपदा सबका करते है सामना 

मध्यभारत के जंगलों में नासूर बन रहे नक्सलवाद के खिलाफ हरी धारीदार वर्दी पहने बारूद बिछाई गयी धरती पर तिरंगा थामें संविधान और क़ानून की रक्षा करने वाले कोबरा भी इसी CRPF के जवान हैं ।लोकतंत्र के उत्सव चुनाव के दौरान शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान का बीड़ा उठाने वाले जवान जिनके बूटों की धमक सुनकर उपद्रवियों के दिल मे दहशत फैल जाती है वो भी इस CRPF के जवान है।कश्मीर की घाटी में एक हाथ में लाठी, दूसरे में ढाल थामे पड़ोसी मुल्क के टुकड़ों की लालच और मानवाधिकारों की आड़ में गद्दारों के हाथों बरसते पत्थरों को चुपचाप सहने वाले भी CRPF के जवान हैं और श्रीनगर एयरपोर्ट की निगेहबानी करने वाले भी CRPF के जवान है ।संसद की सुरक्षा मे PDG के जवान भी CRPF ही के जवान हैं।

प्राकृतिक आपदा त्रासदी, भूकंप, सुनामी, बाढ़ के समय पर नजर आने वाली एन डी आर एफ (NDRF) भी इस बल के जवान है । देश मे VVIP, VIP, मुख्यमंत्रीयो, मंत्रीयो की सुरक्षा ड्यूटी मे तैनात काली वर्दी पहने एन.एस.जी. NSG में और सफारी सूट पहने एस.पी.जी. SPG मे भी CRPF के जवान है ।

सीमा सुरक्षा बल (BSF):- जो बल हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा मे दिन रात तैनात है वो अर्द्ध सैनिक बल की सीमा सुरक्षा बल है । देश के दुश्मनों की पहली गोली इन्ही जवानों के सीनों पर लगती है । सेना तो BSF के पोस्टो से काफी पीछे है।
भारतीय तिब्बत सीमा बल (ITBP):– यह बल देश की चीन से लगी हुई हमारी सीमा की सुरक्षा के लिए जिम्मेवार है । इस बल के जवान माइनस 40 डिग्री तापमान मे भी अपनी चौकियों पर तैनात रहते है । पहली गोली से आखरी गोली का मुकाबला इस बल का जवान करता है ।

सशस्त्र सीमा बल (SSB) :-इस बल के जवान नेपाल भूटान सीमा को सुरक्षित रखने के लिए कार्यवाही करते है ।
केंद्रीय औधोगिक सुरक्षा बल (CISF):- देश की सभी महत्वपूर्ण औधोगिक संस्थानों, मेट्रो, एयरपोर्ट आदि सुरक्षा की जिम्मेवारी इसी बल के जवानों की है । इस बल के जवानों को अर्जित अवकाश भी अन्य बलों से 30 दिन कम ही मिलता है ।
असम राइफल्स  इस बल के जवान हमेशा के लिए अपने सम्पूर्ण सेवाकाल मे सिर्फ पूर्वोत्तर राज्य असम के जंगलों मे उग्रवाद को समाप्त कर इस देश के संविधान की रक्षा कर रहे है ।

भारत सरकार से यह है माँग
1. पैरामिलिट्री के जवान को हमले मे मरणोपरांत शहीद का दर्जा।
2. पैरामिलिट्री जवानों को पुरानी पेंशन व वन रैंक वन पेंशन (OROP) लागू हो।
3. पैरामिलिट्री स्पेशल पे ।
4. केंद्रीय अर्द्ध सैनिक कल्याण बोर्ड का गठन।
5. पैरामिलिट्री को CSD कैंटीन की सुविधा लागू हो।
6. जिला स्तर पर CGHS/EGHS मेडिकल सुविधा लागू हो ।
7. रेल मे एक पैरामिलिट्री कोच की सुविधा लागू हो।
8. पैरामिलिट्री के जवानों को भी सेवानिवृत्त के बाद ex army की तरह दर्जा दिया जाए।

हर जगह किया जाता है भेदभाव

पूर्ण सैनिक की तरह देश की सेवा और सुरक्षा मे अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले जवानों को अर्द्ध सैनिक ही कहा जाता है । हमारी अपनी ही सरकार इस अर्द्ध सैनिक बलों के साथ वेतन भत्तों, अवकाश एवं अन्य सुविधाओं मे बहुत अधिक भेदभाव करती है । देश सेवा मे अपनी जान देने वाला सेना का जवान शहीद और अर्द्ध सैनिक बलों का जवान मृतक माना जाता है । जब दुश्मन की गोली कोई भेदभाव नही करती है तो हमारी सरकार क्यों करती है?? सेना के जवानों को पुरानी पेंशन मिलती है मगर अर्द्ध सैनिकों बलों को 2004 से बाद के जवानों को नही मिलती है । सेना के जवानों के लिए CSD कैंटीन सुविधा है और अर्द्ध सैनिक बलों के लिए CPC है । मिलिट्री के जवानों को 28 दिन का आकस्मिक अवकाश मिलता है जबकि पैरामिलिट्री के जवानों को सिर्फ 15 दिन का आकस्मिक अवकाश मिलता है क्योंकि पैरामिलिट्री के जवानों का घर परिवार ही नही होता है ।

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रेलवे से लेकर अस्पताल तक नहीं है कोई सुविधा

रेलवे मे हर रेल मे एक स्पेशल मिलिट्री कोच होता है मगर 20 लाख पैरामिलिट्री के जवानों के लिए नही मिलता है जबकि सबसे अधिक मूमेंट (सफर)पैरामिलिट्री के ही जवान करते रहते है । अर्द्ध सैनिक बलों के लिए MH की तरह कोई उच्च स्तरीय अस्पताल की सुविधा नही है । वेतन के साथ साथ भत्ता मे भेदभाव होता है , सेना के लिए मिलिट्री सर्विस अलाउंस मिलती है मगर पैरामिलिट्री के लिए कुछ भी नही मिलता है । सेना के जवान चाहते है कि अर्द्ध सैनिक बलों को भी उनकी तरह सब सुविधा दी जाए लेकिन सरकार ऐसा नहीं करती। सरकार ने आजतक केवल सेना को ही देश का रक्षक समझा है और अर्द्ध सैनिक बलों को सरकार ने दूसरे दर्जे का नागरिक नहीं बना दिया है।

 

 

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