देहरादूनः एक साथ एक परिवार में तीन दुल्हने लेके पहुंची दूल्हे के घर बारात , बरातियों का हुआ जोरदार स्वागत

विवाह स्मारोह के लिए दुल्हा दुल्हन के घर बारात लेकर जाता है। बच्चों के बारात संबन्धित प्रश्नों पर उन्हे समझाया भी जाता है कि लड़का बारात लेकर जाता है। उसकी बारात नहीं आती। दुल्हन की बारात आती है। लेकिन रविवार को एक परिवार में एक साथ तीन दुल्हने बारात पहुंच गई जिसे सुन लोग हैरान हुए। क्योंकि आमतौर पर दूल्हा बरात लेकर दुल्हन के घर आता है, लेकिन आपको बता दे कि देहरादून जिले के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में दुल्हन के दूल्हे के यहां बरात लाने की अनूठी परंपरा है। यहां कि स्थानीय भाषा में इसे ‘जोजोड़ा विवाह’ कहते हैं।

जानकारी के अनुसार रविवार को लखऊ खत के किस्तूड़ गांव से अमिता (मोनिका), बहलाड़ खत के क्वासा गांव से प्रिया (ममता) व समाल्टा खत के भाकरौऊ गांव से रक्षा जौनसारी बरात लेकर कनबुआ गांव पहुंची। और ‘जोजोड़ा विवाह’ की परंपरा का निर्वाह करते हुए सहिया क्षेत्र के कनबुआ गांव निवासी जालम सिंह पवार के घर बरात लेकर पहुंचीं। जहां बारातियों का जोरदार स्वागत किया गया। और धूमधान से तीनों विवाह सबके अर्शिवाद के साथ सम्पन्न कराए गए। बता दें कि सालों की प्रथा निभाते हुए जालम सिंह पवार ने संयुक्त परिवार की परंपरा का निर्वाह करते हुए तीन पुत्रों देवेंद्र (धीरज), प्रदीप व संदीप का विवाह एक ही दिन करने का फैसला किया। इसकी तैयारियां पिछले कई माह से चल रही थीं। चारों भाइयों जालम सिंह पंवार, सूरत सिंह पंवार, कल सिंह पंवार व खजान सिंह पंवार ने बरातियों का जोरदार स्वागत किया। विवाह समारोह में मेहमानों को तरह-तरह के पारपंरिक लजीज व्यंजन परोसे गए। जो लोग इस प्रथा से अनजान थे उनके लिए यह विवाह बेहद अनोखा रहा।

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आपको बता दें कि जौनसार बावर मसूरी के 15 किलोमीटर दूर चकराता तहसील में देहरादून जिले का एक गाँव है। यह स्थान जौनसारी जनजाति का मूल स्थान है जिनकी जड़े महाभारत के पाण्डवों से निकली हुई हैं। स्थानीय जौनसार बावर क़बीले की संस्कृति अन्य पहाड़ी क्षेत्रों से भिन्न है जो गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल प्रदेश में हैं। इसी का एक रिवाज बहुविवाह और बहुपति प्रथाएँ हैं जो यहाँ देखी जाती हैं। यहाँ के अमीर आदिवासी कई पत्नियाँ रखते हैं जबकि उनके गरीब साथी अपनी पत्नी को दूसरों के साथ साझा करते हैं, यहाँ कि इस प्रथा में बहुपति सभी आपस में भाई होते हैं।  इस बात को कई बार महाभारत में वर्णित पाँच पांडवों के द्रौपदी से विवाह से जोड़कर देखा जाता है, जिससे कि जौनसारी लोग अपने वंश को जोड़कर देखते हैं। मानव-शास्त्र के अध्ययनों से पता चलता है कि इन प्रथाओं के स्थान पर एक संगमन ही प्रचलित हो रहा है।

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