उत्तराखंड में स्थित है एक ऐसा शिव मंदिर, जहां भोले की पूजा करने पर होता है अपशगुन…

उत्तराखंड में स्थित है एक ऐसा शिव मंदिर, जहां भोले की पूजा करने पर होता है अपशगुन...

पिथौरागढ़: देवभूमि उत्तराखंड को देश-विदेश में सभ्यता, संस्कृति और आस्था का प्रतीक माना जाता है, बद्रीनाथ,केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के अतिरिक्त यहां कई ऐसे मंदिर है जिसके बारे में शायद ही किसी को पता होगा। आस्था का प्रतीक मानें जाने वाले इन मंदिरों में कुछ हैरान करने वाली घटनाएं भी है, जो भक्तों को असामंजस्य की स्थिती में डाल देती है। ऐसी ही एक हैरान करने वाली आस्था उत्तराखंड के पिथौरागड़ जिले से हैं। जहां भगवान शिव का मंदिर तो हैं पर हैरान करने वाली बात यह है कि इस मंदिर में सोमवार को भगवान शिव की पूजा नहीं होती है।

बता दें कि उत्तराखंड जिले के पिथौरागढ़ से 6 किलोमीटर दूर बल्तिर गांव में हथिया देवाल मंदिर है। इस मंदिर की खासियत है कि इस मंदिर में शिवलिंग तो मौजूद है लेकिन सिर्फ दर्शन मात्र के लिए यहां कभी भी भगवान की पूजा नहीं की जाती है। इस मदिर को देखने के लिए हर साल यहां देश विदेशों से लोग आते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर का नाम हथिया देवाल मंदिर इसिलए पड़ा क्योंकि यह मंदिर एक हाथ से बनाया गया है। इस मंदिर काफी साल पुराना है। ग्रंथों, अभिलेखों में भी इस मंदिर का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि प्राचीन समय में यहां कत्यूरी राजाओं का शासन था। उस समय के राजाओं को स्थापत्य कला से बेहद लगाव था।

 

लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण एक कुशल कारीगार ने किया है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि कारीगर ने इस मंदिर का निर्माण एक हाथ से किया है। और एक ही रात में इस मंदिर का निर्माण किया। जिस वजह से इस मंदिर का नाम हथेला देवाल पड़ा। बताया जा रहा है कि इस मंदिर में शिवलिंग का अरघा विपरीत दिशा में बन गया, जिसकी पूजा लाभदायक नहीं होती है। बल्कि दोषपूर्ण मूर्ति का पूजन अनिष्टकारक भी हो सकता है। यही कारण हैं कि मंदिर में विराजमान शिवलिंग की पूजा नहीं की जाती है। बता दें कि इस मंदिर की स्थापत्य कला नागर और लैटिन शैली की है। चट्टान को तराश कर इस मंदिर का निर्माण किया गया है, वहीं चट्टान से ही मंदिर में विराजमान शिवलिंग को बनाया गया है।

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