फ्रांस से लेकर भारत तक जानिए क्या है राफेल विवाद,15 दिन में राफेल डील से कैसे कटा HAL का नाम

What is the Rafael dispute?

राफेल विमान मामला सियासी घमासान का गवाह बना हुआ है। इस मामले में कांग्रेस लगातार मोदी सरकार पर डील के जरिए अनिल अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को फायदा पहुंचाने का आरोप लगा रही है। साथ ही जेपीसी जांच की मांग उठा रही है, तो वहीं केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने किसी भी तरह के घोटाले से इनकार करते हुए इस डील को रद्द नहीं करने की बात कही है। इस सब के बीच फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति का बयान भी सुर्खियों में है, जिसे आधार बनाकर राहुल गांधी ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘चोर’ कह रहे हैं।

बता दे की राफेल विमान पर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान का अभी तक किसी ने खंडन नहीं किया है। फ्रांस सरकार ने उनके बयान पर नाख़ुशी ज़रूर ज़ाहिर की है मगर यह नहीं बताया है कि अनिल अंबानी का नाम किसकी तरफ से रखा गया था। फ्रांस्वा ओलांद ने भी अभी तक अपने बयान का खंडन नहीं किया है। शुक्रवार से सोमवार आ गया। शुक्रवार को मीडियापार्ट वेबसाइट ने फ्रांस्वा ओलांद का बयान छापा था। 10 अप्रैल 2015 को फ्रांस्वा ओलांद और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच ही समझौता हुआ था। मीडिआपार्ट भी अपनी ख़बर पर कायम है। उसके एडिटर का एक वीडियो बयान भी चल रहा है जिसमें वो अपने अखबार के इंटरव्यू का बचाव कर रहे हैं और बता रहे हैं कि फ्रांस्वा ओलांद ने साफ-साफ क्या कहा था। राहुल गांधी ने इसे ट्वीट किया था।

क्या है राफेल विवाद?
यूपीए सरकार ने 600 करोड़ रुपये में एक राफेल का सौदा किया था। अब बताया जा रहा है कि सरकार को एक राफेल करीब 1600 करोड़ रुपये का पड़ेगा। राफेल डील में 50 प्रतिशत ऑफसेट क्लॉज का प्रावधान है। यानि इस सौदे की पचास प्रतिशत कीमत को रफाल बनाने वाली कंपनी, दसॉल्ट को भारत में ही रक्षा और एयरो-स्पेस इंडस्ट्री में लगाना होगा। इसके लिए दसॉल्ट कंपनी ने भारत की रिलायंस इंडस्ट्री से करार किया है। अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस इंडस्ट्री ने जो कंपनी बनाई है, उसके साथ मिलकर दसॉल्ट कंपनी भारत में ज्वाइंट वेंचर कर रही है। ये दोनों मिलकर भारत में नागरिक विमानों के स्पेयर पार्ट्स बनाने जा रही हैं। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया था कि “36 राफेल आईजीए (इंटर गर्वमेंटल एग्रीमेंट) में ऑफसेट्स की मात्रा 50 प्रतिशत है, जिसमें योग्य उत्पादों और सेवाओं के निर्माण या रखरखाव के लिए प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण में निवेश शामिल हैं। ”
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ऐसे शुरू हुआ मामला

साल 2007 में वायुसेना की ओर से मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MMRCA) खरीदने का प्रस्ताव सरकार को भेजा गया। इसके बाद भारत सरकार ने 126 लड़ाकू विमानों को खरीदने का टेंडर जारी किया। इसके बाद जिन लड़ाकू विमानों को खरीदना था, उनमें अमेरिका के बोइंग F/A-18 सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डस्सॉल्ट राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन F-16 फाल्‍कन, रूस का मिखोयान MIG-35 और स्वीडन के साब JAS-39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे। हालांकि, डस्सॉल्ट एविएशन के राफेल ने बाजी मारी। 4 सितंबर 2008 को रिलायंस ग्रुप ने रिलायंस एयरोस्पेस टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (RATL) नाम से एक नई कंपनी बनाई। इसके बाद RATL और डस्सॉल्ट के बीच बातचीत हुई और ज्वाइंट वेंचर बनाने पर सहमति बन गई। इसका मकसद भविष्य में भारत और फ्रांस के बीच होने वाले सभी करार हासिल करना था। मई 2011 में एयर फोर्स ने राफेल और यूरो फाइटर जेट्स को शॉर्ट लिस्टेड किया।

HAL और डस्सॉल्ट एविएशन के बीच हुए थे हस्ताक्षर
जनवरी 2012 में राफेल को खरीदने के लिए टेंडर सार्वजनिक कर दिया गया। इस पर राफेल ने सबसे कम दर पर विमान उपलब्ध कराने को बोली लगाई. शर्तों के मुताबिक भारत को 126 लड़ाकू विमान खरीदने थे। इनमें से 18 लड़ाकू विमानों तैयार हालत में देने की बात थी, जबकि बाकी 108 विमान Dassault की मदद से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा तैयार किया जाना था। हालांकि इस दौरान भारत और फ्रांस के बीच इन विमानों की कीमत और इनको बनाने की प्रक्रिया शुरू करने के समय पर अंतिम समझौता नहीं हुआ था। 13 मार्च 2014 तक राफेल विमानों की कीमत, टेक्नोलॉजी, वेपन सिस्टम, कस्टमाइजेशन और इनके रख रखाव को लेकर बातचीत जारी रही। साथ ही HAL और डस्सॉल्ट एविएशन के बीच इसको बनाने के समझौते पर हस्ताक्षर हो गए।

कांग्रेस का दावा 526.1 करोड़ रुपए प्रति राफेल विमान की दर से डील

यूपीए शासनकाल में राफेल को खरीदने की डील को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। हालांकि कांग्रेस पार्टी दावा करती है कि उसने 526.1 करोड़ रुपए प्रति राफेल विमान की दर से डील की थी । यह साफ नहीं हुआ था कि Dassault भारत की जरूरतों के मुताबिक इन विमानों को तय वक्त में उपलब्ध कराएगा या नहीं। इसकी वजह यह है कि यूपीए शासनकाल में यह डील पूरी नहीं हुई थी। इसके बाद एनडीए सत्ता में आई और 28 मार्च 2015 को अनिल अंबनी के नेतृत्व में रिलायंस डिफेंस कंपनी बनाई गई। 10 अप्रैल 2015 को पीएम मोदी ने फ्रांस की राजधानी पेरिस का दौरा किया और उड़ान के लिए तैयार 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के अपनी सरकार के फैसले का ऐलान किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना के लिए ये विमान खरीदना बेहद जरूरी है। जून 2015 में रक्षा मंत्रालय ने 126 एयरक्राफ्ट खरीदने का टेंडर निकाला। दिसंबर 2015 में रिलायंस इंटरटेनमेंट ने फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ओलांद की पार्टनर जूली गयेट की मूवी का-प्रोडक्शन में 16 लाख यूरो का निवेश किया। फ्रांस के अखबार मीडिया पार्ट के मुताबिक यह निवेश फ्रांस के एक व्यक्ति के इनवेस्टमेंट फंड के जरिए किया गया, जो अंबानी को पिछले 25 वर्षों से जानता था। हालांकि, जूली गयेट के प्रोडक्शन रॉग इंटरनेशनल ने अनिल अंबानी या रिलायंस के प्रतिनिधियों से मुलाकात करने की बात को खारिज कर दिया। सितंबर 2016 को भारत और फ्रांस के बीच 36 राफेल विमान खरीदने की फाइनल डील पर दस्तखत हुए।

मोदी सरकार ने HAL को दरकिनार कर अनिल अंबानी की रिलायंस को दिलाई डील 

इन विमानों की कीमत 7.87 बिलियन यूरो रखी गई। इस डील के मुताबिक इन विमानों की डिलीवरी सितंबर 2018 से शुरू होने की बात कही गई। फरवरी 2017 को Dassault Reliance Aerospace Ltd (DRAL) ज्वाइंट वेंचर को गठित किया गया। इस दौरान कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने HAL को दरकिनार करके अनिल अंबानी की रिलायंस को डील दिलाई। इस पर रिलायंस डिफेंस लिमिटेड के सीईओ राजेश ढींगरा ने सफाई देते हुए कहा कि उनकी कंपनी को ज्वाइंट वेंचर कॉन्ट्रैक्स सीधे Dassault से मिला और इसमें सरकार का कोई रोल नहीं था। सितंबर 2018 को राफेल डील (Rafale Deal) पर मचे घमासान के बीच अब फ्रांस्वा ओलांद ने नया खुलासा किया। फ़्रेंच अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस का नाम खुद भारत सरकार ने सुझाया था। हालांकि फ्रांस सरकार और Dassault ने इससे किनारा किया है लेकिन विपक्ष के आरोपों को बल मिल गया है।

मोदी कमांडर इन थीफः  राहुल गांधी
वही वित्त मंत्री जेटली ने कहा कि राफेल डील एक साफ सुथरा सौदा है जिसे रद्द करने का कोई सवाल ही नहीं है। जेटली ने आगे कहा कि जहां तक सवाल विमानों के कम या ज्यादा कीमतों का है, तो ये सारे आंकड़े नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के सामने हैं। कांग्रेस भी कैग के पास गई है। उन्होंने कहा कि हम कैग की रिपोर्ट की प्रतीक्षा करेंगे। कैग आंकड़ों के मामले में विशेषज्ञ संस्था है। राफेल विमान की कीमतों को लेकर सरकार का रुख स्पष्ट करते हुए जेटली ने कहा कि फ्रांस और भारत के बीच गोपनीय समझौता पूर्व की यूपीए सरकार के दौरान हुआ था और इस समझौते पर पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी के हस्ताक्षर हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरते हुए उन्हें कमांडर इन थीफ (चोरों का कमांडर) तक कह दिया. राहुल गांधी ने एक वीडियो ट्वीट किया, जिसमें राफेल डील के बारे में समझाया जा रहा है। वीडियो में मौजूद शख्स कह रहा है कि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने राफेल डील के बारे में कहा कि भारत सरकार की ओर से अंबानी की कंपनी का नाम सुझाया गया था और उनके पास कोई विकल्प नहीं था।

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