शब्दों का गिरता स्तर और मुद्दाविहीन राजनीति !

लोकसभा चुनाव 2914 में मोदी के नाम पर भाजपा को जो चमत्कारिक सफलता मिली, उससे मोदी व उनके समर्थकों में उत्साह का होना एक स्वाभाविक क्रिया थी, मगर इस उत्साह में उनके समर्थकों में जो उद्दंडता देखने को मिली, उसमें अब मोदी भी शामिल हो गए। भूल गए कि वह पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं न कि एक समूह में शामिल अपने कुछ समर्थकों के। उनकी यह भूल लोकतांत्रिक मर्यादा की संघीय ढांचा पर कई सवाल खड़े करने लग गई, जो आज भी वहीं खड़ी है।

इस उत्साह में जहां मोदी जी भाषाई दरिद्रता के शिकार होने लगे वहीं उनके समर्थक उद्दंडता के शिकार होकर देश को जहरीला बनाने में लग गए। जो आज तक जारी है। नतीजा यह हुआ कि मोदी ने जिसे पप्पू की उपाधि दी वह भी उसी बीमारी के शिकार हो गए और उन्होंने चैकीदार ही चोर है का शोर मचाना शुरू कर दिया है। इसका अंत कहां है? यह तो भविष्य तय करेगा, मगर इन सब कमियों और खामियों के बीच आज की राजनीति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

पिछले पांच सालों की हमारी राजनीति बचपने के दौर से गुजर रही है। फर्क बस इतना है कि बचपन समाज के गढ़े हुए शब्दों को दुहराता है और हमारी राजनीति इन शब्दों को खुद गढ़ रही है। भाषा के स्तर पर यह ओछापन राजनीति की मर्यादा को ही चोट नहीं पहुंचा रही है। बल्कि पद की गरिमा को भी तार तार कर रही है। जब हमारे देश के प्रधानमंत्री पाकिस्तान को ललकारते हुए कहते हैं कि घर में घुस कर मारेंगे तो लगता कि कोई सड़क छाप गुंडा मुहल्ले वालों को चेतावनी दे रहा है। मोदी का यह शौर्य भले ही उनकी जमात और आम समझ वालों को ताली बजाने पर बाध्य करता हो मगर हमें माथा पीटने पर मजबूर कर देता है।

विपक्ष का भी वही हाल है। पूरा विपक्ष राम मंदिर, कश्मीर, पाकिस्तान में उलझा है, जैसे कि देश बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बीमारी, प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका है। देश में इस तरह की कोई समस्या ही नहीं है।

नरेंद्र मोदी के भाई प्रह्लाद मोदी थाने के सामने धरने पर बैठे !

यह सच है कि पूंजीवादी सत्ता जनता को जनमुद्दों से भटकाकर अपने हित साधने की कोशिश में रहती है। पिछली सभी सरकारों ने ऐसा किया है, बावजूद इसके उनमें लोकतांत्रिक मूल्यों की कुछ सीमाएं रही हैं। मगर पिछले पांच सालों में यह मूल्य इस तरह से गिर गया है, जिससे देश में पूरे लोकतंत्र के वजूद पर ही सवाल खड़ा होने लगा है।

आज देश की राजनीति कई बेकार के मुद्दों में उलझी हुई है। जो एक तरफ आम लोगों को बौद्धिक तौर पर दरिद्र बना रही है वहीं सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद का गिरता स्तर देश के संकट को एक दूसरे स्तर पर ही खड़ा कर दिया है।

  • कमलेश भट्ट-‘कमल’

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