बॉलर जिसने पोलियो वाले हाथों को बनाया हथियार !

क्रिकेट की दुनिया में बी.एस. चंद्रशेखर ऐसा नाम है जो अपनी खास तरह की बॉलिंग के लिए जाने जाते हैं। चंद्रशेखर सिर्फ अपनी बॉलिंग को लेकर ही प्रेरित नहीं करते बल्कि उन लोगों के लिए भी एक इंस्पिरेशन हैं, जो विकलांग हैं।

1964 से 1979 के बीच में भारतीय क्रिकेट ने कई जीत और हार देखीं लेकिन ये एक ऐसे व्यक्ति का भी गवाह है जो अपने पोलियो वाले हाथों से बॉलिंग करता था. दाहिने हाथ में पोलियो होने के बावजूद चंद्रशेखर अपनी मारक गेंदबाजी के तरीके के लिए जाने जाते थे. उनके इसी नायाब तरीके के लिए उन्हें न सिर्फ साथी खिलाड़ियों की भरपूर तारीफ मिली बल्कि चंद्रशेखर ने भारत को क्रिकेट के मैदान पर कई जीत भी दिलाईं।

chandrasekhar indian bowler के लिए इमेज परिणामबीएस चंद्रशेखर यानि भागवत सुब्रमण्य चंद्रशेखर को 5 या 6 साल की उम्र में पोलियो हो गया था. खुद उन्हें और उनके परिवार को ये नहीं मालूम चला कि कब उनके साथ ऐसा हो गया. उस समय इनका हाथ बिल्कुल भी काम नहीं करता था. हालांकि 10 साल की उम्र से इनके हाथ में सुधार हो हो गया लेकिन यह 100 फीसदी सही नहीं हुआ. उस समय तक चंद्रशेखर को भी नहीं पता था कि गली में क्रिकेट खेलते खेलते वे कभी भारतीय क्रिकेट के सुपरस्टार बन जायेंगे।

जब चंद्रशेखर 10 साल के थे तब उनके घर वाले बैंगलोर आकर रहने लगे, यहां गली में शौकिया क्रिकेट खेलते-खेलते चंद्रशेखर को सिटी क्रिकेटर्स में खेलने का मौका मिला। लेकिन अभी तक चंद्रशेखर के मन में इंडियन क्रिकेट में खेलने का खयाल नहीं आया था और न ही उन्होंने सोचा था कि वो कभी इंडियन क्रिकेट टीम का हिस्सा बन पायेंगे। उन्होंने सिटी क्रिकेटर्स को सिर्फ इसलिए ज्वाइन किया था ताकि रबर की बॉल से खेलने से निजात मिल सके और वो लेदर की बॉल से खेल सकें।

पोलियो का प्रभाव उनकी कलाई पर अधिक था, लेकिन इसी के प्रभाव के कारण चंद्रशेखर की कलाई गेंद फेंकते वक्त ज्यादा ट्विस्ट हो जाती थी, वह सामान्य प्रकार के स्पिनरों से अलग रहे। वह वास्तव में सबसे तेज लेग-ब्रेक बॉलर रहे, जिसके कारण अच्छे-अच्छे बल्लेबाज आसानी से आउट हो जाते थे।

चंद्रशेखर रिची बेनॉड के फैन थे। रिची बेनॉड ऑस्ट्रेलिया के लेग स्पिनर और ऑलराउंडर थे। रिची बेनॉड के प्रभाव के कारण 1963 चंद्रशेखर को रियलाइज हुआ कि उन्हें लेग स्पिनर बनना है। यह निर्णय उनके लिए बेहतर भी साबित हुआ और इसी कारण से वे इंडियन क्रिकेट टीम के लिए चुन लिए गए।
चंद्रशेखर ने इंटरनेशनल क्रिकेट की शुरूआत 1964 में की, जब उन्होंने अपना पहला मैच इंग्लैण्ड के खिलाफ खेला. तब से लेकर अपने करियर के अंतिम समय तक 58 टेस्ट खेले और कुल 242 विकेट लिए। अपने करियर में उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन वो रहा जब उन्होंने 79 रन देकर 8 विकेट लिए. ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में होने वाली सीरीज में उन्होंने 12 विकेट देकर 104 रन लिए और भारत को ऑस्ट्रेलिया में पहली बार जीत दिलाई।

चंद्रशेखर ने अपना एकमात्र वन-डे न्यूजीलैण्ड के खिलाफ खेला जिसमें उन्होंने 3 विकेट लिए. इनके बेहतरीन प्रदर्शन और कन्ट्रीब्यूशन के लिए उन्हें 1972 में विज्डन क्रिकेटर ऑफ द इयर का अवॉर्ड दिया गया।

1960 से 1970 के बीच चंद्रशेखर के अलावा प्रसन्ना, बिशन सिंह बेदी और वेंकट राघवन भी बेहतरीन स्पिनर्स थे। इन चारों को उस समय स्पिन क्वार्टेट कहा जाता था। चंद्रशेखर मात्र क्लासिकल लेग स्पिनर नहीं रहे, उनकी गेंदबाजी में तरह-तरह की ट्रिक्स रहीं. लम्बे बाउन्सिंग रन-अप के बाद वो तेज गुगली गेंद फेंकते थे।

19 वर्ष की आयु में टीम में शामिल हो जाने के बाद उन्होंने वेस्टइंडीज व इंग्लैंड की टीमों के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन इस दौरान स्कूटर से उनकी दुर्घटना हो गयी जिससे उन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण सीरीज में बाहर रहना पड़ा। लेकिन तीन सालों के बाद जब चंद्रशेखर को 1971 में इंग्लैंड दौरे के लिए टीम में शामिल किया गया। यहां ओवल में (1971) इंग्लैंड की टीम के खिलाफ सिर्फ 38 रन देकर 6 विकेट ले लिए और पूरी टीम 101 रनों पर सिमट कर रह गई। लगातार दो बॉल में उन्होंने जॉन एड्रिक और कीथ फ्लेचर के दो विकेट लिये और इंग्लैंड की धरती पर इंग्लैंड को हराकर भारत ने जीत दर्ज की।

चंद्रशेखर जितना अपने बेहतरीन बॉलिंग के लिए जाने जाते हैं उतना ही अपनी खराब बैटिंग के लिए भी जाने जाते हैं। कुछ तो उनकेchandrasekhar indian bowler के लिए इमेज परिणाम खराब हाथ की देन थी और बची-खुची कसर उनकी खराब बैटिंग स्किल्स ने पूरी कर दी थी। इंडिया ने वैसे भी नम्बर 6 के बाद आने वाले बल्लेबाजों का खासा स्ट्रगल देखा है। 2010 के आस पास ये कमी काफी हद तक पूरी हुई है, लेकिन ये वो वक्त था जब टेल-एंडर्स से बैटिंग की उम्मीद करना बेवकूफी ही साबित होता था। चंद्रशेखर जब 1977-78 में ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर थे तो उन्हें एक बैट दिया गया जिसमें एक छेद था। उस सीरीज में वो एक के बाद एक 4 बार बिना खाता खोले आउट हुए थे, जबकि गेंद से वो बढ़िया परफॉर्म कर रहे थे। इसकी ही याद में उन्हें ऑस्ट्रेलिया की टीम ने बढ़िया बल्ला दिया था जिसमें बीच में एक छेद था। अपने पूरे कैरियर में वो 23 बार जीरो पर आउट हुए और कुल 167 रने बनाये जबकि कुल विकेट 242 हैं।

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