उत्तराखंड की संस्कृति को दर्शाता लोक त्योहार फूल देई , बॉलीवुड तक पहुंची इसकी छाप

Folk festival showing the culture of Uttarakhand, flower dei

उत्तराखडं की संस्कृति अपने आप में अनूठी है। दुनिया में देवभूमि के नाम से पहचान बनाने वाला उत्तराखंड अपनी इन्ही कुछ संस्कृतियों के लिए सबसे अलग है उसमे एक है यहां के लोक त्योहार। यहां के निवासी त्योहार प्रेमी होते हैं। रोज एक नई परेशानी से रुबरु होने, जंगली जानवरों के आतंक और दैवीय आपदाओं से घिरे रहने के बाद भी यहां के लोग हर महीने में एक त्योहार तो जरुर ही मना लेते हैं। इनके त्योहार किसी न किसी रुप में प्रकृति से जुड़े होते हैं। प्रतृती का आभार व्यक्त करते हुए यह इन त्योहारो को हर्षो उल्लास के साथ मनाते है। उसी त्योहार की श्रंखला में एक है फूल देई।

फूलों का पर्व फूलदेई-हर रंग में विश्वास और अहसास है। सांस्कृतिक परंपराएं, महानतम संदेश और उच्चतम आदर्शों की भव्य स्मृतियों के साथ यह त्योहार मनाया जाता है। चैत्र मास की संक्रान्ति को फूलदेई के रुप में मनाया जाता है, जो बसन्त ऋतु के स्वागत का त्यौहार है। इस दिन छोटे बच्चे सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली/फ्यूंली, बुरांस, बासिंग आदि जंगली फूलो के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को चुनकर लाते हैं और एक थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते, नारियल और इन फूलों को सजाकर हर घर की देहरी पर लोकगीतों को गाते हुये जाते हैं और देहरी का पूजन करते हुये गाते हैं-
फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,फूल देई, छम्मा देई,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार……फूल देई-छ्म्मा देई।
गांव के हर घर के आंगन में आकर इन गीतों को गया जाता हैं। जिसके फलस्वरुप घर के मुखिया द्वारा उनको चावल, आटा या अन्य कोई अनाज और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। बसन्त के आगमन से जहां पूरा पहाड़ बुरांस की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगो से भर जाता है। वहीं चैत्र संक्रान्ति के दिन बच्चों द्वारा प्रकृति को इस अप्रतिम उपहार सौंपने के लिये धन्यवाद अदा करते हैं। इस दिन घरों में विशेष रुप से सई* बनाकर आपस में बांटा जाता है।

फूल देई त्योहार की धूम अब बॉलीवुड तक पहुंच गई है। पिछले साल आई ‘ट्यूबलाइट’ फिल्म ने इस त्योहार को विश्व पटल तक पहुंचाया है। इस फिल्म में अल्मोड़ा जिले के चित्रेश्वर निवासी गायक कलाकार देव नेगी ने ‘छम्मादेई, छम्मादेई जतुक दिला सई’ गीत गाया है। इस समय उत्तराखंड के टिहरी में बॉलीवुड फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ की शूटिंग चल रही है। और यहां कई सितारे आए हुए है , वह भी इस त्योहार की संस्कृति से वाकिफ हो रहे है।

यह पर्व नई फसल, नव ऋतु के स्वागत का भी पर्व है। प्रकृति के नूतन शृंगार का अभिनंदन करते हुए प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं से घर की देहरी (देली) का कन्याओं द्वारा किया जाने वाला पूजन इसका प्रतीक है। वह कामना करती हैं कि जैसे प्रकृति ने अन्न, पुष्प, बौर, मौसम आदि द्वारा अपना चतुुर्दिक शृंगार किया है। वहीं पुरुषार्थ, चतुष्दय मेरे पिता के घर आए।

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